Submission 2823

"सुनहरी ज़िंदगी"

Submitted By: Dr. Prashantini P. Marali

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ये ज़िंदगी तूने खून लेकर दिया कुछ भी नहीं मेरे लिये तेरे दामन में क्या कुछ भी नहीं? अगर चाहे तो इन हाथों की आप तलाशी ले लो इन हाथों में लकीरों के सिवा कुछ भी नहीं। या खुदा अब के ये किस रंग मे आई है यह बहार मुरझाए हुए पेड़ों पर हरियाली कुछ भी नहीं यह दिल भी जिद पर अड़ा है किसी बच्चे की तरह या तो सब कुछ इसे मिल जाए या कुछ भी नहीं। ये जिंदगी तुझ को जी लिया है कोई अफ़सोस नहीं और ज़हर खुद मैने पी लिया है कोई अफ़सोस नहीं मैंने मुजरिम को भी मुजरिम नही कहा इस दुनिया में बस यही ज़ुर्म किया है मैने कोई अफसोस नहीं। एक लमहे में सिमटकर आई है यह सफ़र बनकर "ज़िंदगी" इस तरह पहरों में तुझे सोचती रही मैं ज़िंदगी अजब यह जिंदगी कैद है और इस में कैद है दुनिया का हर इनसान रिहाई माँगता है इस ज़िंदगी से और फिर रिहा होने से डरता है यह इनसान।

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Reg ID: HF25-5448

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