नेता था या फिर सत्ता का गुलाम?
Submitted By: vivek
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सवालों की किताब में, पन्ने कई अधूरे हैं, आज़ादी के उजालों में, कुछ साये भी गहरे हैं। क्यों भगत की फाँसी पर, तू मौन खड़ा रहा, जवां लहू सिसकता था, और तू धरा रहा। क्यों दंगों की लपटों में, इंसानियत जलती रही, क्यों नफ़रत की आग में, माँएं रोती पलती रही। तेरे उपवास, तेरे वचन, कुछ जगह काम आए, पर करोड़ों की भीड़ में, आँसू न थम पाए। इतिहास तुझे महात्मा कहे या फिर सवाल, तेरे नाम से उठेगा, हर पीढ़ी में बवाल। ------------------------------------------------ महात्मा कहे जाने वाले, तेरी चुप्पी क्यों बोल गई? भगत की फाँसी पर तेरी आँखें क्यों डोल गई? किसके दबाव में तूने जवानों का खून बहने दिया, क्यों इंकलाब की आवाज़ को तूने चुप रहने दिया? तेरे उपवास, तेरी प्रार्थना – सब दिखावे से लगे, जब इंसानियत जली तो तेरे कदम भी भाग खड़े। आज भी इतिहास पूछता है तेरी खामोशी का हिसाब, क्या सच में तू नेता था या फिर सत्ता का गुलाम?
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Reg ID: HF25-5252
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